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BY-DHEERAJ KUMAR DIXIT/NEW DELHI

UPDATE-1 MAY 7.46 PM

ब्रह्मा जी की पूजा क्यों नहीं होती ...

सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार  ब्रह्मा ने इस जगत की रचना की। विष्णु इस जगत का पालन करते हैं और भगवान शिव इस दुनिया का संघार करते हैं। हालांकि धरती पर भगवान विष्णु और शिव के तो आप ने कई मंदिरो के दर्शन किये होंगे लेकिन इंडिया में ब्रह्मा जी के मंदिर इतने कम क्यों मिलते है ? आइये हम आपको यहाँ इस कहानी की सच्चाई से रूबरू करते है  राजस्थान राज्य के अजमेर जिले के अंतर्गत पुष्कर के धार्मिक स्थान है जहाँ प्रतिवर्ष प्रसिद्ध ‘पुष्कर मेला’ लगता है। पुष्कर जैसा ब्रह्मा जी का पौराणिक मंदिर कहीं दूसरी जगह कम ही देखने को मिलता है। ये एक ऐसी जगह है जहां धरती के लोग उस रचनाकार की पूजा करते हैं जिसकी वजह से इस दुनिया का अस्तित्व है।

पुष्कर का मतलब है वो तालाब जिसका निर्माण पुष्प यानि फूलों से होता है। मान्यता है कि एक बार ब्रह्मा के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। यज्ञ के लिए जगह की तलाश करनी थी। लिहाजा उन्होंने अपनी बांह से निकले हुए कमल को धरती लोक की ओर भेज दिया। वो कमल इस शहर तक पहुंचा। कमल बगैर तालाब के नहीं रह सकता इसलिए यहां एक तालाब का निर्माण हुआ। यज्ञ के लिए ब्रह्मा यहां पहुंचे। लेकिन उनकी पत्नी सावित्री वक्त पर नहीं पहुंच पाईं। यज्ञ का समय निकल रहा था। लिहाजा ब्रह्मा जी ने एक स्थानीय ग्वाल बाला से शादी कर ली और यज्ञ में बैठ गए।

सावित्री थोड़ी देर से पहुंचीं। लेकिन यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और औरत को देखकर गुस्से से पागल हो गईं। उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दिया कि जाओ इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। यहां का जीवन तुम्हें कभी याद नहीं करेगा। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।
Why Brahma Is Not Worshipped - ब्रह्माजी को क्यों ...

अन्य देवताओं की तरह ब्रह्माजी की ...

और तो और यहां के पुरोहित और पंडित तक अपने घरों में ब्रह्मा जी की तस्वीर नहीं रखते। कहते हैं कि जिन पांच दिनों में ब्रह्मा जी ने यहां यज्ञ किया था वो कार्तिक महीने की एकादशी से पूर्णिमा तक का वक्त था। और इसीलिए हर साल इसी महीने में यहां इस मेले का आयोजन होता है। ये है तो एक आध्यात्मिक मेला लेकिन वक्त के हिसाब से इसका स्वरूप भी बदला है। कहा ये भी जाता है कि इस मेले का जब पूरी तरह आध्यात्मिक स्वरूप बदल जाएगा तो पुष्कर का नक्शा इस धरती से मिट जाएगा। वो घड़ी होगी सृष्टि के विनाश की।

हर साल एक विशेष गूंज कार्तिक के इन दिनों में यहां सरोवर के आसपास सुनाई पड़ती है जिसकी पहचान कुछ आध्यात्मिक गुरुओं को है। मान्यता ये भी है कि इन पांच दिनों में जगत की 33 करोड़ शक्तियां यहां मौजूद रहती हैं। ये शक्तियां उस ब्रह्म की उपासना के लिए आती हैं जिनकी वजह से इस दुनिया का वजूद है। इस दौरान सरोवर के पानी में एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति का जिक्र है जिससे सारे रोग दूर हो जाते हैं।

आजतक किसी को पता नहीं कि इस मंदिर का निर्माण कैसे हुआ। बेशक आज से तकरीबन एक हजार दो सौ साल पहले अरण्व वंश के एक शासक को एक स्वप्न आया था कि इस जगह पर एक मंदिर है जिसके सही रख रखाव की जरूरत है। तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे को दोबारा जीवित किया। लेकिन उसके बाद जिसने भी किसी और जगह ऐसे मंदिर के निर्माण की कोशिश की वो या तो पागल हो गया या फिर उसकी मौत हो गई। भगवान ब्रह्मा के इस शहर में आकर लोगों को एक अलग आध्यात्मिक अहसास होता है। कई सैलानी तो ऐसे भी हैं जो यहां आते हैं तो यहीं के होकर रह जाना चाहते हैं।

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