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DHEERAJ KUAMR DIXIT/NEW DELHI

SPECIAL REPORT

डिस्कवरी न्यूज़ के हॉरर स्टोरीस के फ़ॉलोअप में हमारा उदेश्य अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है लेकिन हकीकत से आपको रूबरू करना भी हमारा दायित्व है इस स्टोरीज के विसुअल को हम आगामी महीनो में आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे भूत प्रेत की कहानिया को हम बचपन से अपने दादा दादी नाना नानी से भले ही सुनते चले आ रहे है लेकिन कही न कही कहानिया तभी बनती है जब कुछ न कुछ उनका हकीकत से झुकाव होता है आज हम बात कर रहे उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में बने हॉस्पिटल की जहा दावा किया गया है है की यह किस्सा नहीं बल्कि सच्चाई है इसी से समझा जा सकता है की आज भी शाम होने पर गांव में बच्चो अस्पताल वाले भूत से डराकर चुप कराया जाता है लोग यह भी कहते है कि वहां से ऐसी आवाजे आती है कि गांव के लोगो के लिए रात काटना मुश्किल भरा होता है किसी ने आज तक हिम्मत नहीं जुटाई कि कहारने और रोने की आवाजे कहा से आ रही है

ये है पूरी कहानी रेनी गांव के अस्पताल की

यह कहानी है मऊ जिले के रानीपुर थाना के कनकपुर गांव से 19 km दूर  परदहा ब्लॉक के अंतर्गत रेनी गांव में बने सरकारी स्वास्थ केंद्र अस्पताल के खंडहर की है जो १९८२ में बना था लेकिन  नकारात्मक शक्तिओ की वजह से इससे बंद करना पड़ गया,बताते है इस खंडहर का ऐसा आलम है की लोग दिन में भी इसके आस पास से बने रास्ते से भी जाने से कतराते है,बताते है इस खंडहर का ऐसा आलम है की दिन में भी लोग इसके आस पास से बने रास्ते से भी जाने से कतराते है घनी झाड़िओ के बावजूद रास्ता इतना साफ़ दिखाई देता है जैसे की अभी अभी किसी ने रास्ता को साफ किया हो जब की लोग बताते है आज तक किसी ने भी यहाँ कोई सफाई नहीं करवाई है गांव वालो की माने तो अगर दिन में कोई १२ बजे भी अस्पताल के पास के कोई गुजरे तो उसकी हालत भी ख़राब हो जाती है,कई बार तो लोगो को लगता है कि अस्पताल में खूब भीड़ है और लोगो को रोने कि आवाजे आती है और सबसे बड़ी बात इंसान तो इंसान परिंदा भी इस अस्पताल के दीवारों पर नहीं बैठते है सूरज के डूबते गांव के लोग उस रस्ते को सुनसान को छोड़ देते है अगर बहुत मज़बूरी हुयी तो वहां से झुंड बनाकर गुजरते है उन्हें हर वक़्त इस बात का डर लगा रहता है कि कही भूत प्रेतों का साया न पड़ जाये यहाँ तक दावा किया गया है कि रात में उल्लुओ के रोने की आवाज लोगो के कानो तक पड़ती है रात होती है तो गांव वाले सोचते है किसी तरह रात कटे और सुबह सूर्य भगवान के दर्शन हो गांव वालो का कहना है गांव की रात बहुत सताती है लगता है जैसे रात कटती ही नहीं यहाँ तक यह भी दावा किया गया है की कभी कभी अस्पताल की खिड़कियों से रौशनी आती दिखाई देती है और वहां से कहारने की आवाज सुनाई देती है गांव वालो की माने तो यह आवाज लम्बे समय से सुनाई देती रही है लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं जुटाई की यहाँ जाकर सच्चाई का पता लगाया जा सके गांव वालो का कहना है की जिस दिन रोने की आवाज सुनाई देती है उस दिन मानो गांव में मरघट का सन्नाटा छाया रहता है और हर किसी को सनका रहती है की कोई घटना न हो जाये

अस्पताल की प्रेत आत्माओ का सच 

   १९८२ में बना स्वास्थ केंद्र जो आज बना गया प्रेत आत्माओ का हॉन्टेड प्लेस

गांव में रहने वाले ७५ साल के केदार बताते है की यह अस्पताल लोगो के स्वास्थ चिकित्सा सुविधा के लिए १९८२ में सरकार की ओर से बनवाया गया था, पर क्या पता था की यहाँ जिंदो का नहीं मुर्दो का इलाज होगा केदार बताते है बात पुश्तों की है जब गांव में रहने वाले दो पट्टीदारों के बीच आपसी लड़ाई हुयी तो उनके परिवार में घायल एक युवक की मौत इलाज के अभाव में हो गयी थी और बाद में कुछ दिनों बाद उसी युवक को हॉस्पिटल के सीढ़ियों पर बैठे देखे जाने की बात कही जाने लगी लोगो को कहना था कि वह युवक किसी से कुछ नहीं बोलता था बस बचाओ बचाओ की आवाज लगा कर कहरता रहता था उस समय यह घटना जंगल में आग के तरह फ़ैल गयी और किसी की हिम्मत नहीं हुयी की वहां जाये और हकीकत का पता लगाए कुछ दिन तक लोग इसे अफवाह मानते रहे लेकिन जब कई लोगो ने ऐसा महसूस किया तब से लोगो का शंका हकीकत में बदलने लगा ,बताते है की घटना के कुछ दिन बाद उनका पडोसी भी घर छोड़ कर चला गया जिसका आज तक कुछ पता नहीं चल सका है और कुछ सालो बाद जब यहाँ सरकारी अस्पताल बनकर तैयार हुआ तब से रात में यहाँ टूटने फूटने की आवाजे आना शुरू हो गयी,कुछ दिन तक लोगो ने इसे नजर अंदाज करने का प्रयास किया लेकिन दिन प्रतिदिन महनूस रातो का कहर बढ़ता ही गया लोगो का यह भी कहना था की डॉक्टरों के जाने के बाद हॉस्पिटल के दरवाजे अपने आप खुल जाते थे,कुछ दिन तक लोगो ने इसे हॉस्पिटल के कर्मचारियों की लापरवाही मानी लेकिन गलती एक दिन होती है रोज रोज नहीं,ऐसी हरकते कुछ दिनों तक पैरामेडिकल स्टाफ ने हल्के में लिए लेकिन जब लोगो को महसूस होना शुरू हुआ तो कइयों ने अपने ट्रांसफर तक करवाने के लिए प्रशासन से गुहार लगाने लगे लेकिन अजीबो गरीब हरकते दिन प्रतिदिन बढ़ती गयी अन्तः हॉस्पिटल छोड़ कर सारे स्टाफ चले गए अंत में हॉस्पिटल को बंद करना पड़ गया

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